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ठीक होकर घर लौटी 212 ग्राम वजन वाली दुनिया की सबसे छोटी प्रीमेच्योर बच्ची

आपको यह घटना इसलिए याद दिला रहे हैं क्योंकि सिंगापुर में महज 212 ग्राम की प्रीमेच्योर बच्ची पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटी है। बच्ची पिछले 13 महीने से अस्पताल में भर्ती थी। पिछले हफ्ते ही बच्ची को घर लाया गया है और अब वह पूरी तरह से ठीक है।

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New Delhi: हरियाणा में पिछले साल एक महिला डॉक्टर ने 300 ग्राम वजन की प्रीमेच्योर बच्ची को यह कहते हुए कूड़े में डाल दिया था कि यह जिंदा नहीं रह पाएगी‚ इसके बाद करीब 36 घंटे तक वह नन्नी सी मासूम बच्ची कूड़े में तड़पती रही। मानवता को शर्मसार कर देने वाली ये घटना सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो पुलिस ने मौके पर पहुंचकर बच्ची को अस्पताल में भर्ती कराया था हालांकि कुछ समय बाद ही मासूम की मौत हो गई थी।

आपको यह घटना इसलिए याद दिला रहे हैं क्योंकि सिंगापुर में महज 212 ग्राम की प्रीमेच्योर बच्ची पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटी है। बच्ची पिछले 13 महीने से अस्पताल में भर्ती थी। पिछले हफ्ते ही बच्ची को घर लाया गया है और अब वह पूरी तरह से ठीक है। यह दुनिया की सबसे कम वजन की प्रीमेच्योर बच्ची बताई जा रही है।

BBC न्यूज के मुताबिक घटना सिंगापुर के नेशनल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल की है‚ जहां पिछले साल 9 जून को एक महिला की डिलीवरी महज 5 महीने में हो गई थी। जिस समय डिलीवरी हुई उस वक्त बच्ची के अंग भी पूरी तरह से विकसित नहीं हुए थे। जन्म के समय बच्ची का वजन महज 212 ग्राम था। बच्ची को आईसीयू में रखा गया। जन्म के समय बच्ची की लंबाई मात्र 24 सेंटीमीटर थी।

नर्स भी हैरान

हैरानी की बात यह है कि इस बच्ची को जब आईसीयू में भर्ती कराया गया तो वहां बच्चों की देखभाल करने वाली नर्स भी हैरान थी। नर्स का कहना था कि उसने अपने 22 साल के करियर में अब तक इतनी छोटी नवजात बच्ची को नहीं देखा है। बच्ची का नाम क्वेक यू शुआन रखा गया है। बताया जा रहा है कि बच्ची को जन्म के बाद कई महीने तक वेंटिलेटर पर रखा गया था‚ लेकिन अब बच्ची पूरी तरह से स्वस्थ है और उसका वजन 6 किलो 300 ग्राम है। यह बच्ची दुनिया के सबसे छोटे प्रीमेच्योर बच्चों में से एक है।

भगवान का चमत्कार

डॉक्टरों का कहना है कि बच्ची का इलाज करना उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण था। उसकी त्वचा बहुत ही नाजुक थी। शरीर भी इतना छोटा था कि उसके साइज की सांस नली भी हॉस्पिटल में मौजूद नहीं थी। उसके लिए डायपर के भी तीन हिस्से करके पहनाया जाता था।खास बात यह है कि कोरोना महामारी के बीच विपरीत हालत में बच्ची का जिंदा रहना कुदरत के करिश्मे से कम नहीं है।

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