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Meerut: जब दोस्त रफीक की याद में कुंज बिहारी लाल ने बनवाया था मकबरा

ये कहानी आज से तक़रीबन 1450 साल पुरानी है लेकिन दोस्ती की कद्र करने वालो के लिए ये आज भी एक दम ताजी है ।

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Author: Manoj kumar

Meerut: “चले जायेगे दूर हमें याद में क्या दोगे, सो जायेगे मौत की नींद हमें ख्वाब में क्या दोगे, दोस्ती है ये उम्र भर की लेकिन मौत के बाद हमें क्या दोगे “ ये वो चंद अल्फाज है जो की रफीक अहमंद कंधारी और कुंज बिहारी लाल की दोस्ती पर बिल्कुल सटीक बैठती है। ये कहानी आज से तक़रीबन 1450 साल पुरानी है लेकिन दोस्ती की कद्र करने वालो के लिए ये आज भी एक दम ताजी है ।

मकबरा अहमद का मकबरा‚ फोटो आँखों देखी Live

दरअसल , मेरठ के पुर्वा महावीर इलाके में माई के तकिये कब्रिस्तान में स्थित रफीक अहमद कंधारी का मकबरा दो दोस्तों के दोस्ती की कहानी अपने ही अंदाज में बयान करता है । एक ऐसी दोस्ती की दास्तान जो धर्म और मुल्क की दीवारों को तोड़ कर एक मिसाल बन गयी।

ये दोस्ती परवान चढ़ी सरहद पार अफगानिस्तान में जहा कुंज बिहारी लाल हीरो का व्यापर किया करते थे और वही उनकी दोस्ती रफीक अहमंद कंधारी से हुई। दोस्ती का ये खुशनुमा दौर ज्यादा दिन नही चल सका और अचानक अफगानिस्तान के हालात बिगड़े और कुंज बिहारी लाल को अपना सारा व्यापार वही छोड़ कर वापस हिंदुस्तान आना पड़ा।

आयशा मस्जिद‚ फोटो आँखों देखी Live

लेकिन अफगानिस्तान में रफीक अहमंद , कुंज बिहारी की सम्पत्ति की देख भाल करते रहे और एक दिन सब कुछ समेट कर दाने – दाने को मोहताज अपने दोस्त कुंज बिहारी को ढूंढते हुए हिदुस्तान आ गये। रफीक अहमंद को देख कर कुंज बिहारी की ख़ुशी का ठिकाना न रहा और कुंज बिहारी ने रफीक अहमंद को दोस्ती का वास्ता देकर वापस अफगानिस्तान नही जाने दिया ।

इस के बाद दोनों दोस्तों ने कसम खाई जो आज की दुनिया वालो के लिए एक मिसाल है। दोनों ने ये फैसला लिया की दोनों में से जो भी पहले इस दुनिया से रुक्सत होगा दूसरा उसकी याद में एक स्मारक बनवाएगा। दुर्भाग्य से रफीक अहमद इस दुनिया से चल बसे और उनकी याद में कुंज बिहारी लाल ने एक मकबरा बनवाया जिस में आज भी उनकी दोस्ती के फूलो की खुशबू ताज़ा है ।

मकबरा अहमद की कब्र‚ फोटो आँखों देखी Live

लेकिन अफ़सोस की आधे से ज्यादा जर जर हो चुकी दोस्ती और हिन्दू , मुस्लिम एकता की ये एक शानदार मिसाल आज राह देख रही है की कब कोई प्राशासनिक आधिकारी या स्वम सेवी संस्था आगे आए और हिन्दू मुस्लिम दोस्ती की मौहब्बत की इस मिसाल को ज़मिदोज़ होने से बचा सके।

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