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उत्तर प्रदेश

क्या..विधान परिषद के चुनाव से पहले ही पार्टियों में बन है गई आपसी सहमति ?

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 12 सीटों पर 28 जनवरी को चुनाव होना है. लेकिन इस बार विधान परिषद की 12 सीटों पर वोटिंग नहीं होगी बल्कि सर्वसम्मति से सभी विधायक निर्वाचित हो जायेंगे. सपा के 2 और बीजेपी के खाते में 10 सीटें आयेंगी, लेकिन चुनाव बिना किसी खींचतान के हो जायें तो इसके बड़े राजनीतिक मायने होते हैं. तीन महीने पहले नवम्बर 2020 में हुए राज्यसभा के चुनाव में जो घमासान दिखा था, विधानपरिषद के चुनाव तक आते-आते सब शांत कैसे हो गया ? छिना-झपटी में लगी रहने वाली पार्टियों के बीच आखिर एका कैसे हो गया? तो आईये जानते हैं कि पिछले तीन महीने में बीजेपी, सपा और बसपा की चालों में कैसे परिवर्तन आया और क्यों?

सबसे पहले बात सत्ताधारी बीजेपी की कर लेते हैं. छोटे से छोटे चुनाव में भी आक्रामक और ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करने की लड़ाई लड़ने वाली बीजेपी ने परिषद की एक सीट आखिर क्यों छोड़ दी? ये जरूर है कि इसे जीतने के लिए उसके पास पर्याप्त विधायकों की संख्या नहीं थी, लेकिन वो जीत से इतनी भी दूर नहीं थी कि प्रयास के बावजूद उसे हासिल न कर ले. परिषद में 10 सीटें जीतने के बाद बीजेपी के पास 27 अतिरिक्त वोट थे. 31 वोटों की न्यूनतम जरूरत से महज 3 दूर. फिर भी बीजेपी ने 11वीं सीट के लिए हाथ-पैर क्यों नहीं मारे. प्रयास तो छोड़िये पार्टी ने कैण्डिडेट भी नहीं खड़ा किया.

इससे सवाल तो बनता है कि आखिर बीजेपी की आक्रामकता इस चुनाव में क्यों गायब रही? (बीजेपी के वोटों की गिनती में बसपा, सपा और कांग्रेस के बागी और निर्दलीयों के वोट जोड़े गये हैं.) प्रवक्ता और एमएलसी विजय बहादुर पाठक ने 11 वें कैण्डिडेट के न खड़े करने के पीछे तर्क दिया कि पार्टी ने सर्वसम्मति से विधायकों के चुने जाने की परम्परा का निर्वाह किया है. सत्ताधारी दल के होने के नाते उसने बड़े भाई का दिल दिखाया है.” सवाल तो इसी बदली भूमिका से खड़े हो रहे हैं.

वहीं राज्यसभा चुनाव से ही झुंझलायी सपा विधानपरिषद के चुनाव में सबसे ज्यादा फायदे में रही. 1 विधायक जीता सकती थी, लेकिन बिना किसी कश्मकश के दो मिल गये. इस नतीजे से गदगद अखिलेश यादव ने यहां तक कह दिया कि यदि वे तीसरा कैण्डिडेट खड़ा किये होते तो वो भी जीत जाता. अखिलेश ने तो यहां तक कह दिया कि बीजेपी के विधायक उन्हें वोट देना चाहते थे. अब इसका मतलब तो यही है कि अखिलेश यादव शायद ये कहना चाह रहे थे कि वो बीजेपी को तोड़ सकते हैं. बीजेपी की नरमी से एक और विधायक को परिषद में भेजने का लाभ उठाने वाली सपा के मुखिया अखिलेश की ये दिलेरी क्या कम बड़े बदलाव का संकेत है ?

सबसे बड़ा हृदय परिवर्तन तो बहुजन समाज पार्टी का दिखायी पड़ा है. राज्यसभा चुनाव के समय मायावती ने कहा था कि परिषद के इलेक्शन में सपा को हराने के लिए वे कुछ भी करेंगी, लेकिन इस चुनाव में मायावती ने कुछ भी नहीं किया. उन्होंने भी सपा के दूसरे कैण्डिडेट को आसानी से जीतने दिया. पार्टी ने दो पर्चे खरीदे थे, लेकिन किसी को मैदान में नहीं उतारा. तो तीन महीने के भीतर ही अखिलेश यादव को हर हाल में हराने की मंशा मायावती ने क्यों छोड़ दी? क्या ये कम बड़ा परिवर्तन है? शायद बसपा ने भी बीजेपी की तरह बड़ा दिल दिखाया होगा.

अब जब बड़े-बड़े धुरंधरों ने ही हथियार डाल दिये तो भला कांग्रेस और दूसरी छोटी पार्टियों को कौन पूछे. इस जंग के न होने से इनका तो धर्मसंकट कट गया क्योंकि इन्हें अपना स्टैण्ड जाहिर करने की नौबत ही नहीं आयी.

बता दें कि परिषद के 12 विधायकों का कार्यकाल 30 जनवरी को खत्म हो रहा है. इन्हें भरने के लिए चुनावी प्रक्रिया चल रही है. 12 सीटों के लिए 12 ही उम्मीद्वार मैदान में है इसलिए वोटिंग की जरूरत नहीं है. बल्कि सभी के सभी निर्विरोध 6 साल के लिए विधायक बन जायेंगे. इसमें बीजेपी के 10 और सपा के 2 विधायक बनेंगे.

[न्यूज साभार- न्यूज-18]

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