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उत्तर प्रदेश

मेरठ में SMA का दूसरा मामला : 9 माह के रेयांश की जिंदगी के लिए भी 16 करोड़ का इंजेक्शन जरूरी, जितना हो सके कीजिए मदद

उत्तरप्रदेश के मेरठ में स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी (SMA) जैसी गंभीर बीमारी का दूसरा केस भी सामने आ गया। एसएमए से पीड़ित यह बच्चा 9 महीने का रेयांश सूरी है और इसकी जिंदगी बचाने के लिए भी 22 करोड़ रुपये (6 करोड़ टैक्स) कीमत का Zolgensma इंजेक्शन लगाया जाना है। बड़ी बात यह है कि रेयांश को एसएमए टाइप वन है, यह इस बीमारी की सबसे खतरनाक स्टेज है। ये दुनिया में कम ही बच्चों को होती है और इससे ग्रसित बच्चे के जीवित रहने की संभावना हद से हद 18 महीने तक रहती है। यानि रेयांश को जल्द से जल्द यह इंजेक्शन लगाया जाना है। हालांकि इतना महंगा इंजेक्शन लगवाना किसी भी आम आदमी के बस में नहीं है, ऐसे में रेयांश के परिजन अब क्राउड फंडिंग का सहारा ले रहे हैं, वहीं सरकार से भी मदद की उम्मीद है।

मेरठ के पूर्व डिप्टी सीएमओ का धेवता है रेयांश

रेयांश के नाना डॉ अशोक अरोरा मेरठ के डिप्टी सीएमओ रह चुके हैं। डॉ अशोक मेरठ के मोदीपुरम के रहने वाले हैं। रेयांश के माता पिता रूद्राक्षी और मनीष सूरी दिल्ली के रहने वाले हैं। रेयांश का जन्म 2 मई 2020 को हुआ था। नाना डॉ. अशोक ने बताया कि जन्म के समय रेयांश बिल्कुल ठीक था। 5-6 महीने तक तो सब कुछ नॉर्मल था, लेकिन उसके बाद रेयांश के पैरों में मूवमेंट नहीं होती थी। उन्होंने बताया कि

रेयांश के पैरों में मूवमेंट न होती देख हमने डॉक्टरों से संपर्क किया, डॉक्टरों ने कहा कि यह बच्चों में नॉर्मल है, कुछ समय बाद वह बैठने लगेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हमने फिजियोथेरेपी भी करवाई, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इसके बाद हमने फरवरी माह में ही दिल्ली के एम्स और गंगाराम अस्पताल में रेयांश को दिखाया। वहीं दिल्ली की लाल पैथ लैब में रेयांश का टैस्ट करवाया। इसमें स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी (SMA) टाइप वन की पुष्टि भी हुई।

रेयांश के पास बस 9 महीने का समय

डॉ. अशोक अरोरा ने बताया कि रेयांश को एसएमए की सबसे खतरनाक स्टेज टाइप वन है। ऐसा होने पर बिना किसी की मदद से बच्चा सिर तक नहीं हिला पाता। हाथ-पैर ढीले रहते हैं। कुछ भी निगलने में भी दिक्कत आती है। अभी रेयांश नौ माह का है और टाइप वन से पीड़ित बच्चे को 18 माह की उम्र तक Zolgensma इंजेक्शन लगना जरूरी होता है। हमने फंड जुटाने के लिए सोशल मीडिया और कुछ क्राउड फंडिंग प्लेटफॉर्म का सहारा लिया है, लेकिन अभी बहुत कम अमाउंट ही जुटा पाएं हैं। सरकार से भी मदद की गुहार लगाई है, लेकिन अभी तक कोई मदद नहीं मिली है। देश की जनता, खासकर दिल्ली और मेरठ के लोगों से ही उम्मीद है। हम जल्द से जल्द फंड जुटा पाएंगे तो रेयांश भी बाकी बच्चों की तरह बड़ा होकर स्कूल जा पाएगा, खेल पाएगा और अपने व हमारे सपनों को पूरा करेगा।

रेयांश के पैरों में मूवमेंट नहीं होती है। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि बाकी चीजों में वह अन्य बच्चों की तरह नॉर्मल है, लेकिन अगर उसे समय पर इंजेक्शन नहीं लगा तो उसकी जान जा सकती है।

जैसा रेयांश के पेरेंट्स ने बताया

आप मदद करेंगे तो रेयांश भी देख पाएगा दुनिया

रेयांश को बचाया जा सकता है लेकिन उसके लिए एक खास इंजेक्शन की जरूरत है जिसे स्विटजरलैंड की कंपनी नोवार्टिस (Novartis) जोलगेन्स्मा (Zolgensma) इंजेक्शन तैयार करती है। यह इंजेक्शन 16 करोड़ की कीमत का है और उसे अमेरिका से मंगवाया जा सकता है। रेयांश के पिता मिहिर एक मिडिल क्लास फैमिली के हैं। उनके लिए इतना महंगा इंजेक्शन खरीदना सपने में भी मुमकिन नहीं है। अगर ये इंजेक्शन रेयांश को नहीं लगाया गया तो वह इस दुनिया को ज्यादा दिन नहीं देख पाएगा इसलिए वे इस इंजेक्शन को खरीदना चाहते हैं। अब रेयांश के पेरेंट्स ने उसकी जान बचाने के लिए रेयांश के मां बाप ने क्राउड फंडिंग का सहारा लिया है। इसके तहत एक क्राउंड फंडिंग का पेज बनाया गया है जिस पर जाकर रेयांश की जान बचाने के लिए आर्थिक मदद की जा सकती है।

क्या है SMA बीमारी?
स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी (SMA) बीमारी हो तो शरीर में प्रोटीन बनाने वाला जीन नहीं होता। इससे मांसपेशियां और तंत्रिकाएं (Nerves) खत्म होने लगती हैं। दिमाग की मांसपेशियों की एक्टिविटी भी कम होने लगती है। चूंकि मस्तिष्क से सभी मांसपेशियां संचालित होती हैं, इसलिए सांस लेने और भोजन चबाने तक में दिक्कत होने लगती है। SMA कई तरह की होती है, लेकिन इसमें Type 1 सबसे गंभीर है।

स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी (SMA) एक न्यूरो मस्क्यूलर डिसऑर्डर है। यह एक जेनेटिक बीमारी है जो जीन में गड़बड़ी होने पर अगली पीढ़ी में पहुंचती है। बच्चे में यह डिसऑर्डर होने पर धीरे-धीरे उसका शरीर कमजोर पड़ने लगता है। वह चल फिर नहीं पता। शरीर की मांसपेशियों पर बच्चे का कंट्रोल खत्म होने लगता है इससे शरीर के कई हिस्सों में मूवमेंट नहीं हो पाता।

5 तरह की होती है स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी

  • टाइप-0: यह तब होती है जब बच्चा पेट में पल रहा होता है। जन्म से ही बच्चे में जोड़ों का दर्द रहता है। हालांकि, ऐसे मामले दुनिया में कम ही सामने आते हैं।
  • टाइप-1: ऐसा होने पर बिना किसी की मदद से बच्चा सिर तक नहीं हिला पाता। हाथ-पैर ढीले रहते हैं। कुछ भी निगलने में भी दिक्कत आती है। तीरा इसी से जूझ रही है।
  • टाइप-2: इसके मामले 6 से 18 महीने के बच्चे में सामने आते हैं। हाथ से ज्यादा असर पैरों पर दिखता है। नतीजा वो खड़े नहीं हो पाते। इशानी इसी से जूझ रही है।
  • टाइप-3: 2-17 साल के लोगों में लक्षण दिखते हैं। टाइप-1 व 2 के मुकाबले बीमारी का असर कम दिखता है लेकिन भविष्य में व्हीलचेयर की जरूरत पड़ सकती है।
  • टाइप-4: स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी का यह प्रकार वयस्कों में दिखता है। मांसपेशियां में कमजोर हो जाती है और सांस लेने में तकलीफ होती है। हाथ-पैरों पर असर दिखता है

ऐसा होता क्यों है

स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी होने पर दिमाग की नर्व सेल्स और स्पाइनल कॉर्ड (रीढ़ की हड्डी) क्षतिग्रस्त होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में ब्रेन मसल्स (दिमाग की मांसपेशियां) को कंट्रोल करने के लिए मैसेज भेजना धीरे-धीरे बंद करने लगता है। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है बच्चे का खुद से हिलना-डुलना बंद हो जाता है।

इस बीमारी का अब तक कोई सटीक इलाज नहीं मिल सका है, सिर्फ दवाओं के जरिए इसका असर कम करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, दावा किया जा रहा है कि Zolgensma इंजेक्शन के एक डोज से इस बीमारी को ठीक किया जा सकता है। यही इंजेक्शन इशानी को लगना है, लेकिन इसकी कीमत 22 करोड़ (6 करोड़ रुपये टैक्स) रुपये हैं।

अगर आप भी मासूम रेयांश की मदद करना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें

मेरठ की डेढ़ साल की इशानी भी इसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित

मेरठ के ही ब्रह्पुरी में रहने वाले अभिषेक वर्मा की डेढ़ साल की बेटी भी स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी (SMA) जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है। फर्क सिर्फ इतना है कि रेयांश को जहां टाइप 1 है वहीं इशानी को टाइप टू है। दोनों ही स्टेज जानलेवा हैं। इशानी के बारे में ज्यादा जानने के लिए यहां क्लिक करें। रेयांश की तरह ही इशानी के पेरेंट्स भी उसके 16 करोड़ का इंजेक्शन खरीदना चाहते हैं, इसीलिए उन्हें भी जनता से ही आस है।

अगर आप भी इशानी की मदद करना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें

जींस पर निर्भर करता है बच्चे का विकास

जब एक बच्चा जन्म लेता है तो उसमें दो तरह के जींस पाए जाते हैं एक माँ से और एक पिता से। दोनों जींस मिलकर बच्चे के नैन नक्श और उसकी पर्सनालिटी तय करते हैं। बच्चे का विकास इन्हीं जींस पर निर्भर करता है। इन्हीं जींस में गड़बड़ी के कारण आज रेयांश छोटी सी उम्र में ही वह ऐसा दर्द झेल रहा है जो शायद हम महसूस भी नहीं कर पाएं।

पूर्व डिप्टी सीएमओ डॉ. अशोक अरोरा ने बताया कि हमारे देश में गर्भावस्था के वक्त जेनेटिक टेस्ट नहीं करवाए जाते, जबकि अमेरिका व अन्य यूरोपियन देशों में ये टेस्ट अनिवार्य होते हैं। इस टेस्ट से पता चल जाता है कि बच्चे को कोई जेनेटिक बीमारी तो नहीं। अगर हमारे देश में ये टेस्ट होने लगें तो गंभीर बीमारियों का पता गर्भ में ही चल जाएगा और उसी समय बच्चे को एक नया जीवन दिया जा सकेगा।

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