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पैसे के अभाव में अपनों के शवों को Ganga किनारे रेत में दबाने को मजबूर परिजन, कुत्ते कर रहे शवों की दुर्गति

मीडिया ने उत्तर प्रदेश के 27 जिलों की  ग्राउंड रिपोर्ट बनाई। यहां 30 पत्रकारों ने खुद स्थिति का जायजा लिया। इससे यह पता चला कि गंगा मां के तट पर बिजनौर से उत्तर प्रदेश के बलिया तक 2 हजार से अधिक शव मिले हैं।

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गंगा किनारे बालू रेत में दफन शव

गंगा के किनारे सैकड़ों दफन लाशें मिली हैं। इन जगहों पर मीडिया ने पहुंचकर परिजनों से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि अंतिम क्रिया के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए दफना दिया गया।

रायबरेली में गंगा किनारे बालू में दफन शवों को नोच रहे कुत्ते

रायबरेली के गागासो गंगा घाट पर रेत में 200 से ज्यादा शवों को देख ग्रामीण दंग रह गए। ग्रामीणों का कहना है कि इन शवों को अब कुत्ते नोच रहे है। पिछले एक महीने के भीतर इन शवों को यहां दफनाया गया है।  बताया गया कि करीब डेढ़ किलोमीटर चौड़ी गंगा की धारा अभी बमुश्किल तीस फुट चौड़ी रह गयी। इस वजह से शव ढोने वालों को गंगा किनारे दाह संस्कार के लिए रेत में करीब एक किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है। इतनी दूरी तक लकड़ी ले जाने की समस्या से बचने के लिए गंगानदी पर बने पुल से  लकड़ी फेंकी जाती है। हालांकि मीडिया ने जब एडीएम प्रशासन राम अभिलाष से सवाल किया तो उन्होंने इससे इनकार किया।

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प्रयागराज में फाफामऊ गंगा घाट के किनारे बड़ी संख्या में शव दफन मिले

प्रयागराज के फाफामऊ गंगा घाट के आसपास के लोगों ने बताया कि यहां रोजाना करीब 15 से 20 शवों को दफनाया जा रहा है.  घाट के किनारे शव दफनाने आए एक व्यक्ति ने कहा कि वे महंगी लकड़ी और दाह संस्कार का खर्च नहीं उठा सकते, इसलिए वे यहां शव को दफनाने जा रहे हैं।  मां गंगा उन्हें मुक्ति दिलाएंगी।  घाट के किनारे 150 से ज्यादा शव दफन हैं।

पिंडियां फैली हुई हैं…

दाह संस्कार के बाद शव (पिंडी) के अवशेषों को कपड़े में रेत के साथ गंगाजी में विसर्जित कर दिया जाता है। गंगा के दूसरी ओर प्रवाहित होने के कारण अब पिंडियों के बंधन बालू में फैले हुए हैं। कुत्ते भी यहां फैली गंदगी को गांव तक पहुंचा रहे हैं, ऐसे में संक्रमण फैलने की आशंका है।

संक्रमितों के शवों से इंकार नहीं किया जा सकता है।

श्मशान घाट में अंतिम संस्कार किए जा रहे शवों में कोविड के पॉजिटिव होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। गांवों में अभी भी लोग कोविड जांच कराने से परहेज कर रहे हैं। जो लोग बीमारी के कारण अपने घरों में मर रहे हैं, उनका इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कोविड-19 से मरने वालों की संख्या पॉजिटिव नहीं थी। इस तरह अगर मृत शवो में कोविड पॉजिटिव शव हुए तो संक्रमण फैलने की संभावना बढ़ जाती है।

श्मशान घाट पर लकड़ी के दामों में बढ़ोतरी

कोरोना में मौतों की संख्या में वृद्धि के कारण, श्मशान घाटों पर लकड़ी की कीमत बढ़ गई है। सामान्य दिनों में जहां लकड़ी 800 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक बेची जाती थी, अब मनमाना दर वसूला जा रहा है। नाम न छापने की शर्त पर घाट पर श्मशान सामग्री बेचने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि इस बार लकड़ी 1500 से 1800 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक रही है। श्मशान घाट पर जमादार और पांडा भी पैसे लेते हैं। अभी दाह संस्कार पर करीब 10- 12 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं। जो गरीब पहले से ही अपने परिवारों के इलाज में अपनी जमा पूंजी लगा चुके हैं, उनके लिए दाह संस्कार में अधिक पैसा खर्च करना संभव नहीं है, इसलिए वे गंगा में शवों को दफना रहे हैं।

दरअसल, शव को दफनाने में जमादार को ही गड्ढा खोदना होता है। इसमे जमादार कुछ पैसो में ही गढ्ढा खोदकर दे देता है, हालांकि गड्ढा ज्यादा गहरा नहीं खोदा जा रहा है। शव को गड्ढे में गाड़ा जा रहा है और रेत के ढेर से ढका जा रहा है।  तेज हवा चलने पर बालू उड़ जाती है और शव ऊपर ही दिखाई देने लगे है।

हालांकि प्रशासन ने प्रेस नोट जारी कर इस तरह की खबरों का खंडन किया है। लेकिन जगह-जगह गंगा किनारे बालू रेत में दफन सैकड़ो शव दिख जायेगे जो प्रशासन को शायद नही दिख रहे।

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