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UP: अखाड़ा परिषद के महंत नरेंद्र गिरी की संदिग्ध मौत, जानिए क्या होते हैं अखाड़े

आपको बता दें कि बाघंबरी गद्दी मठ और निरंजनी अखाड़े की अकूत धन-संपदा को लेकर अक्सर विवादों का नाता रहा है। ऐसे ही विवादों को लेकर निरंजनी अखाड़े के मठ में दो महंतों की संदिग्ध मौतें पहले भी हो चुकी हैं। मठ और अखाड़े की सैकड़ों बीघे जमीन बेचने को लेकर अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि का अपने करीबी शिष्य आनंद गिरि के बीच विवाद है। जिसका जिक्र उन्होंने अपने सुसाइड नोट में भी किया है।

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Manoj kumar

महंत नरेंद्र गिरी

प्रयागराज: अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से हड़कंप मच गया है। महंत का शव प्रयागराज के अल्लापुर स्थित बाघंबरी मठ स्थित उनके आवास में पंखे से लटका मिला है। हालांकि पुलिस के पहुंचने से पहले ही शिष्यों ने उनको नीचे उतार लिया था। आला अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर जांच पड़ताल करते हुए मठ को सीज कर दिया है। उनके पास से एक सुसाइड नोट बरामद होने बताया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ समेत कई बड़े नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है।

कुम्भ मेले का एक दृश्य

पुलिस के मुताबिक, इस सुसाइड नोट में मठ और अखाड़े के उत्तराधिकारियों के नाम लिखे गए हैं। इसमें कभी महंत के बेहद करीबी रहे आनंद गिरि के अलावा लेटे हनुमान मंदिर के पुजारी आद्या तिवारी व उनके बेटे संदीप तिवारी का नाम भी है। साथ ही सम्मान व अपमान को लेकर भी कुछ बातें लिखी हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर महंत किस अपमान को लेकर आहत थे?

बाघंबरी मठ

गुरु आदि शंकराचार्य ने बनाये थे 13 अखाड़े

ऐसा माना जाता है कि गुरु आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में 13 अखाड़े बनाए थे। आज तक वही अखाड़े बने हुए हैं। अखाड़ा साधुओं का वह दल है जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि अलख शब्द से ही अखाड़ा शब्द बना है। हमारे देश मे शैव, वैष्णव और उदासीन पंथ के संन्यासियों के कुल 13 अखाड़े मान्यता प्राप्त हैं। मूलत: कुंभ या अर्धकुंभ में साधु-संतों के कुल 13 अखाड़ों द्वारा भाग लिया जाता है। इन अखाड़ों की प्राचीन काल से ही स्नान पर्व की परंपरा चली आ रही है।

आनंद गिरी

मुगलकाल से पहले अखाड़ों को कहा जाता था बेड़ा या जत्था

अखाड़ा शब्द का चलन मुगलकाल से शुरू हुआ था। इससे पहले आश्रमों के अखाड़ों को बेड़ा अर्थात साधुओं का जत्था कहा जाता था। कुंभ मेलों में सभी अखाड़े एक साथ स्नान करते हैं। लेकिन हर कुंभ में शैव और वैष्णवों के अखाड़ों में शुरू से ही संघर्ष रहा है। जिस कारण सन् 1772 में बनी व्यवस्था के अनुसार नासिक के कुंभ में वैष्णव अखाड़े और त्र्यंबकेश्वर में शैव अखाड़े पहले स्नान करते हैं। यह व्यवस्था अभी भी लागू है।

1954 में हुआ अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का गठन

दरअसल शैव और वैष्णवों के अखाड़ों में शुरू से ही संघर्ष रहा है। शाही स्नान के वक्त इन अखाड़ों में आपसी तनातनी के कारण 1954 के कुंभ में भगदड़ मची थी। जिसके के बाद सभी 13 अखाड़ों ने मिलकर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का गठन किया था। इस परिषद का चुनाव हर छह वर्ष में किया जाता है, लेकिन वर्ष 2004 में निर्वाणी अणि के महंत ज्ञानदास के अध्यक्ष बनने के बाद कभी विधिवत ‍चुनाव नहीं हुआ।

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