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Lockdown के बाद अचानक महंगा हुआ इलाज‚ डॉक्टरों ने डबल की फीस‚ मेडिकल स्टोरों पर भी लूट

लॉक डाउन से पहले जिस डॉक्टर की फीस 500 रुपये थी अब उस डॉक्टर की फीस 800 से 1000 रुपये तक हो गयी है। वही जिसकी फीस 800 रूपए थी उसने 1200 से 1500 रूपए तक फीस कर दी है। ये हाल किसी एक जगह का नही है पूरे देश में डॉक्टरों ने लूट का खेल शूरू कर दिया है।

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Author: रवि चौहान

कोरोना वायरस और लॉकडाउन के बाद देश में करीब 70 प्रतिशत से ज्यादा लोगों की आमदनी पहले के मुकाबले आधी रह गई है। काम ठप हो जाने से लोग जैसे-तैसे कर अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। लेकिन बावजूद इसके हर चीज के दाम कोरोना काल से पहले के मुकाबले बढ़ गए है।

चिकित्सा जगत भी उन्ही में से एक है। लॉकडाउन अवधि में क्लीनिक और अस्पताल भी बंद रहे जिससे निजी चिकित्सक एवं संबंधित लोग भी आर्थिक रूप से प्रभावित हुए है। लेकिन लॉकडाउन खुलते ही इन लोगों ने बंदी के दौरान हुई आर्थिक हानि की भरपाई पूरी करने के लिए अचानक लूट मचा दी है। लोगों की आर्थिक स्थिति के बारे में बिना जाने इन लोगों ने अपने हिसाब से रेट तय कर लिए है। जिसके चलते अचानक इलाज कराना मंहगा हो गया है।

औसतन कोरोना काल से पहले का इलाज अब दोगुना खर्च पर हो रहा है। मजबूर लोगों को बिना मोल-भाव के डॉक्टरों की मुंहमांगी फीस चुकानी पड़ रही है। वही इस ओर सरकार या प्रशासन का कोई ध्यान नही है।

पहले से दोगुना हो गई डॉक्टराें की फीस

कोरोना कालखंड में कोरोना वायरस के कारण फैलने वाले संक्रमण से बचाव के नाम पर प्राइवेट डॉक्टर लूट मचा रहे हैं। क्लीनिक में केवल सेनेटाइज व सोशल डिस्टेन्स के नाम पर डॉक्टरों की फीस डेढ़ से दो गुना हो गयी है। हवाला दिया जा रहा है कि हम सोशल डिस्टेन्स व सेनेटाइजर करा रहे है। हालांकि एक दो क्लीनिक को छोड़कर कहीं भी ऐसा देखने को नही मिलता। माना कि वह अपने क्लीनिक को सेनेटाइज कर रहे हैं तो उसका खर्चा पेशेंट से क्यों वसूला जाए और वसूल भी रहें है तो दुगना फीस किस हिसाब से तय की है।

लॉक डाउन से पहले जिस डॉक्टर की फीस 500 रुपये थी अब उस डॉक्टर की फीस 800 से 1000 रुपये तक हो गयी है। वही जिसकी फीस 800 रूपए थी उसने 1200 से 1500 रूपए तक फीस कर दी है। ये हाल किसी एक जगह का नही है पूरे देश में डॉक्टरों ने लूट का खेल शूरू कर दिया है।

कमीशन के लालच में लिख रहें है मंहगी दवाएं

लॉकडाउन खुलते ही डॉक्टरों के कमीशन का खेल भी पहले से ज्यादा प्रभावी हो गया है। उदाहरण के तौर पर जिस 20 रूपए की दवाई से मरीज ठीक हो सकता है। उसी समान साल्ट की 120 रूपए वाली महंगी दवाई खरीदने के लिए डॉक्टर मरीजों पर दबाव बना रहें है। इसमें मेडिकल स्टोरों की भी चांदी हो रही है। वही आमजन को अपना इलाज कराने में भी कठिनाई हो रही है। कुछ अस्पतालों व डॉक्टरों ने तो इससे भी ऊपर उठकर कंपनियों से मनमाफिक प्रिंट पर दवाईयां बनवाकर इस्तेमाल कर रहे है।

इसको ऐसे समझते है

एक एंटीबायटिक इंजेक्शन पर मूल्य 400 रुपये प्रिंट है। मार्किट में 300- 320 का मिल जाता है। जो सही भी है। लेकिन उसी साल्ट का लेकिन दूसरे नाम से यही इंजेक्शन इन हॉस्पिटल व डॉक्टरों के नजदीकी मेडिकल स्टोरों पर 4000 {चार हजार} रुपये प्रिंट का मिलेगा। जिसको ये डॉक्टर कंपनी से सैटिंग करके महंगे दाम डलवाते है।

इस तरह महंगाई के इस दौर में अगर कोई मरीज हॉस्पिटल में भर्ती हो जाये तो डॉक्टरों की चारों तरफ से चांदी हो जाती हैं। चाहे मरीज अपना घर गिरवी रखकर या कर्ज पर लेकर इनको पैसा भरे। इनको सिर्फ मरीज को चारों तरफ से लूटना है।

मेडिकल स्टोरों पर भी हो रही लूट

कोराेना के चलते जहां सभी तरह के काम लोगों के ठप हो गए वही लॉकडाउन में भी मेडिकल लाइन से जुड़े लोगों ने जमकर चांदी काटी है। मेडिकल स्टोर वालों ने इतना मुनाफा पूरे साल में नही कमाया जितना लॉकडाउन में कमाया है। ये सिलसिला लगातार जारी है। मामूली दवाई की कीमत पर भी कई गुना मुनाफा ये लाेग कमा रहे हैं। हर तरह की दवाएं प्रिंट रेट पर बेची जा रही है। जबकि दवाईयों पर 10 प्रतिशत से लेकर 40 प्रतिशत तक की छूट कोरोना काल से पहले दी जा रही थी। लेकिन अब लोगों को कोई छूट नही दी जा रही है।

सरकार तय करे डॉक्टरों की फीस‚ और दवाईयों की कीमत

लोगों का कहना है कि डॉक्टराें द्वारा मरीजों से की जा रही नाजायज वसूली पर रोकथाम के लिए सरकार को हस्‍तक्षेप करने की जरूरत है। सरकार को इलाज की प्रक्रिया को परिभाषित करना चाहिए। आम आदमी की आमदनी को देखते हुए सरकार को बीमारी और उसके इलाज में जायज खर्च के हिसाब से डॉक्टरों की फीस और दवाईयों के रेट तय करने चाहिए। जिससे गरीब व्यक्ति भी आसानी से अच्छा इलाज करा सके।

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